Chapter 11: ऊष्मागतिकी
ऊष्मागतिकी के नियम, उत्क्रमणीय प्रक्रम, कार्नो इंजन और प्रशीतक — पुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों सहित।
Original notes — ready Educational Galaxy के अपने शब्दों में Bhautiki Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)
ऊष्मागतिकी — EG के अपने शब्दों में सार
Book: Bhautiki Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 11 Physics) | Chapter 11 | Medium: हिंदी (English technical शब्द साथ में)
ऊष्मागतिकी के नियम
शून्यवाँ नियम तापीय साम्य की परिभाषा देता है — यदि A, B के साथ और B, C के साथ साम्य में है, तो A, C के साथ भी साम्य में है।
पहला नियम ऊर्जा संरक्षण है: ΔU = Q − W, जहाँ ΔU आंतरिक ऊर्जा में बदलाव, Q दी गई ऊष्मा और W किया गया कार्य है।
प्रक्रमों के प्रकार
समतापी प्रक्रम में ताप स्थिर रहता है और रुद्धोष्म प्रक्रम में ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं होता। समदाबी में दाब स्थिर और समआयतनिक में आयतन स्थिर रहता है।
चक्रीय प्रक्रम में निकाय अपनी आरंभिक अवस्था में लौट आता है, इसलिए ΔU शून्य होता है और किया गया कार्य चक्र के क्षेत्रफल के बराबर होता है।
दूसरा नियम और ऊष्मा इंजन
दूसरा नियम कहता है कि ऊष्मा स्वतः ठंडी वस्तु से गर्म वस्तु की ओर नहीं बहती और कोई इंजन सारी ऊष्मा को कार्य में नहीं बदल सकता।
ऊष्मा इंजन की दक्षता η = 1 − T₂/T₁ होती है। कार्नो इंजन आदर्श इंजन है जिसकी दक्षता केवल दो तापों पर निर्भर करती है। प्रशीतक (refrigerator) उल्टा काम करता है।
इस अध्याय का विचार: ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा-संरक्षण का ही रूप है (ΔQ = ΔU + ΔW), और द्वितीय नियम बताता है कि कौन-सी प्रक्रियाएँ संभव हैं — ऊष्मा स्वयं ठंडी वस्तु से गर्म वस्तु की ओर नहीं बहती, और कोई इंजन ऊष्मा को पूर्णतः कार्य में नहीं बदल सकता।
पुस्तक की संरचना: अध्याय साम्यावस्था और अवस्था चरों से शुरू होकर प्रथम नियम, समतापी/रुद्धोष्म प्रक्रम, ऊष्मा इंजन, प्रशीतक, द्वितीय नियम (केल्विन-प्लांक और क्लॉसियस कथन) और कार्नो इंजन तक जाता है। इस अध्याय में कोई ‘अतिरिक्त अभ्यास’ भाग नहीं है — सभी 10 प्रश्न मुख्य अभ्यास के हैं।
12.1–12.2 साम्यावस्था और अवस्था चर
ऊष्मागतिकीय साम्य का अर्थ है कि निकाय के स्थूल चर (दाब, आयतन, ताप) समय पर निर्भर नहीं करते। आंतरिक ऊर्जा U अवस्था चर है — इसका परिवर्तन केवल आरंभिक और अंतिम अवस्थाओं पर निर्भर करता है; ऊष्मा Q और कार्य W अवस्था चर नहीं हैं — वे प्रक्रम (पथ) पर निर्भर करते हैं।
12.3–12.4 प्रथम नियम और विशिष्ट ऊष्मा
प्रथम नियम: ΔQ = ΔU + ΔW (चिह्न परिपाटी: निकाय को दी गई ऊष्मा धनात्मक, निकाय द्वारा किया गया कार्य धनात्मक)। विशिष्ट ऊष्मा धारिता प्रक्रम पर निर्भर करती है — समदाबी प्रक्रम में C_P और समआयतनी प्रक्रम में C_V भिन्न होते हैं (C_P − C_V = R)।
12.5–12.6 समतापी और रुद्धोष्म प्रक्रम
समतापी प्रक्रम: ताप नियत, ΔU = 0 (आदर्श गैस के लिए), W = nRT·ln(V₂/V₁)। रुद्धोष्म प्रक्रम: Q = 0, ΔU = −W; आदर्श गैस के लिए pV^γ = नियत। मुक्त प्रसार (निर्वात में प्रसार) में W = 0, Q = 0, अतः ΔU = 0 और ताप नियत रहता है — पर मध्यवर्ती अवस्थाएँ साम्यावस्थाएँ नहीं होतीं, इसलिए वे P-V-T पृष्ठ पर नहीं होतीं।
12.7–12.8 ऊष्मा इंजन, प्रशीतक और द्वितीय नियम
ऊष्मा इंजन की दक्षता η = W/Q₁ = 1 − Q₂/Q₁। प्रशीतक का निष्पादन गुणांक α = Q₂/W। द्वितीय नियम: केल्विन-प्लांक कथन — ऐसा कोई प्रक्रम संभव नहीं जिसका एकमात्र परिणाम किसी ऊष्मा भंडार से ऊष्मा का अवशोषण करके उसे पूर्णतः कार्य में रूपांतरित करना हो; क्लॉसियस कथन — ऊष्मा स्वयं ठंडी वस्तु से गर्म वस्तु की ओर नहीं बह सकती।
12.9–12.10 कार्नो इंजन और उत्क्रमणीय प्रक्रम
कार्नो इंजन उत्क्रमणीय इंजन है — दो समतापी और दो रुद्धोष्म प्रक्रमों का चक्र; इसकी दक्षता η = 1 − T₂/T₁ केवल दोनों तापों पर निर्भर करती है, कार्यशील पदार्थ पर नहीं। किन्हीं दो तापों के बीच कार्य करने वाले किसी भी इंजन की दक्षता कार्नो इंजन की दक्षता से अधिक नहीं हो सकती।
तालिका / चार्ट — एक नज़र में
| प्रक्रम | क्या स्थिर है |
|---|---|
| समतापी | ताप |
| रुद्धोष्म | ऊष्मा का आदान-प्रदान नहीं |
| समदाबी | दाब |
| समआयतनिक | आयतन |

चित्र 1: चित्र 1 में ऊष्मागतिकी के नियम और प्रक्रम केंद्र के चारों ओर दिखाए गए हैं।

चित्र 2: चित्र 2 में इस अध्याय की चार सबसे ज़रूरी बातें संक्षेप में दी गई हैं।

नया चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): कार्नो चक्र: दो समतापी + दो रुद्धोष्म प्रक्रम
मुख्य शब्द / Key Terms
- आंतरिक ऊर्जा: निकाय के कणों की कुल ऊर्जा।
- समतापी: स्थिर ताप वाला प्रक्रम।
- रुद्धोष्म: बिना ऊष्मा आदान-प्रदान वाला प्रक्रम।
- दक्षता: कार्य/दी गई ऊष्मा।
- एंट्रॉपी: अव्यवस्था का माप।
- प्रथम नियम: ΔQ = ΔU + ΔW; U अवस्था चर है, Q और W नहीं।
- रुद्धोष्म: pV^γ = नियत (γ = C_P/C_V); समतापी: W = nRT·ln(V₂/V₁)।
- मुक्त प्रसार: W = 0, Q = 0, ΔU = 0, ताप नियत; मध्यवर्ती अवस्थाएँ साम्य में नहीं।
- इंजन दक्षता: η = 1 − Q₂/Q₁; कार्नो: η = 1 − T₂/T₁।
- प्रशीतक: α = Q₂/W; कार्नो प्रशीतक के लिए α = T₂/(T₁ − T₂)।
याद रखें
- पहला नियम: ΔU = Q − W।
- चक्रीय प्रक्रम में ΔU शून्य होता है।
- दक्षता कभी 100% नहीं हो सकती।
- कार्नो दक्षता केवल तापों पर निर्भर करती है।
- रुद्धोष्म में Q शून्य होता है, पर ताप बदलता है।
परीक्षा टिप / आम गलती
आम गलती: समतापी और रुद्धोष्म को एक समझ लेना। समतापी में ऊष्मा का आदान-प्रदान होता है पर ताप स्थिर रहता है; रुद्धोष्म में ऊष्मा नहीं बहती पर ताप बदलता है।
आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन (ΔU) केवल आरंभिक और अंतिम अवस्थाओं पर निर्भर करता है, पर ऊष्मा और कार्य अलग-अलग पथों से अलग-अलग होते हैं। इसीलिए प्रश्न 12.5 में दो भिन्न प्रक्रमों से A से B तक जाने पर कार्य भिन्न (पर ΔU समान) होता है।
प्रथम नियम के अनुकूल होने पर भी कोई प्रक्रम संभव नहीं हो सकता — जैसे ऊष्मा का स्वयं ठंडी वस्तु से गर्म वस्तु की ओर बहना, या किसी इंजन का 100% दक्ष होना। द्वितीय नियम ही इन पर रोक लगाता है।
किसी प्रक्रम में गैस द्वारा किया गया कार्य P-V आरेख के नीचे का क्षेत्रफल होता है। रेखीय प्रक्रम के लिए समलंब का क्षेत्रफल, समदाबी के लिए आयत का क्षेत्रफल — प्रश्न 12.9 इसी से हल होता है (450 J)।
अभ्यास प्रश्न — खुद करके देखें
- ऊष्मागतिकी का पहला नियम लिखिए। संकेत: ΔU = Q − W।
- समतापी और रुद्धोष्म में अंतर बताइए। संकेत: समतापी में ताप स्थिर, रुद्धोष्म में ऊष्मा का आदान-प्रदान शून्य।
- ऊष्मा इंजन की दक्षता का सूत्र लिखिए। संकेत: η = 1 − T₂/T₁।
- चक्रीय प्रक्रम में ΔU कितना होता है? संकेत: शून्य।
- दूसरा नियम क्या कहता है? संकेत: ऊष्मा स्वतः ठंडी से गर्म की ओर नहीं बहती।
मुख्य प्रश्नोत्तर — Core Q&A
- आंतरिक ऊर्जा अवस्था चर क्यों है, पर ऊष्मा और कार्य क्यों नहीं? उत्तर: क्योंकि ΔU केवल आरंभिक-अंतिम अवस्थाओं पर निर्भर करता है; Q और W उस पथ पर निर्भर करते हैं जिससे अवस्था बदली गई।
- मुक्त प्रसार में ताप क्यों नहीं बदलता? उत्तर: क्योंकि W = 0 (निर्वात में प्रसार) और Q = 0 (ऊष्मारोधी) है, अतः ΔU = 0 — आदर्श गैस के लिए ΔU = 0 का अर्थ ताप नियत है।
- कोई इंजन 100% दक्ष क्यों नहीं हो सकता? उत्तर: द्वितीय नियम (केल्विन-प्लांक कथन) — कुछ ऊष्मा अभिगम (सिंक) को अवश्य देनी पड़ती है।
- कार्नो दक्षता किस पर निर्भर करती है? उत्तर: केवल स्रोत और अभिगम के तापों पर (1 − T₂/T₁); कार्यशील पदार्थ पर नहीं।
- प्रशीतक का निष्पादन गुणांक क्या है? उत्तर: α = Q₂/W — ठंडे भंडार से ली गई ऊष्मा प्रति इकाई कार्य; कार्नो प्रशीतक के लिए T₂/(T₁ − T₂)।
उत्तर सहित प्रश्न — बोर्ड-पैटर्न अभ्यास
ये Educational Galaxy के अपने बोर्ड-पैटर्न अभ्यास प्रश्न हैं, बोर्ड प्रश्नों की शैली में लिखे गए हैं। ये असली पिछले वर्षों के प्रश्न होने का दावा नहीं करते।
- कार्नो इंजन आदर्श क्यों कहलाता है? उत्तर: क्योंकि उसकी दक्षता दी गई ताप सीमा में अधिकतम होती है।
- प्रशीतक ऊष्मा इंजन से कैसे अलग है? उत्तर: प्रशीतक कार्य खर्च करके ठंडी जगह से ऊष्मा निकालता है।
- रुद्धोष्म प्रसार में ताप क्यों घटता है? उत्तर: क्योंकि कार्य आंतरिक ऊर्जा से होता है, ऊष्मा नहीं मिलती।
- दक्षता 100% क्यों नहीं हो सकती? उत्तर: क्योंकि कुछ ऊष्मा हमेशा ठंडे स्रोत को देनी पड़ती है।
- शून्यवाँ नियम किसकी परिभाषा देता है? उत्तर: ताप और तापीय साम्य की।
पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — Extension Q&A (मुख्य अभ्यास)
नीचे के प्रश्न पुस्तक के अभ्यास (मुख्य भाग) के प्रश्नों पर आधारित हैं, EG के अपने शब्दों में लिखे गए हैं; उत्तर स्वयं जाँचकर दिए गए हैं।
- 12.1 कोई गीज़र 3.0 लीटर प्रति मिनट की दर से बहते हुए जल को 27 °C से 77 °C तक गर्म करता है: प्रति मिनट आवश्यक ऊष्मा = 3.0×4186×50 = 6,27,900 J; गैस बर्नर के ईंधन की दहन-ऊष्मा 4.0×10⁴ J/g है, अतः ईंधन के व्यय की दर = 6,27,900/4.0×10⁴ ≈ 15.7 g/min।
- 12.2 स्थिर दाब पर 2.0×10⁻² kg नाइट्रोजन (कमरे के ताप पर) के ताप में 45 °C वृद्धि करने के लिए आवश्यक ऊष्मा: मोलों की संख्या = 20/28 ≈ 0.714 mol; C_P = (7/2)R ≈ 29.05 J/mol·K; Q = 0.714×29.05×45 ≈ 933 J।
- 12.3 (a) भिन्न-भिन्न तापों T₁ व T₂ के दो पिंडों को यदि ऊष्मीय संपर्क में लाया जाए, तो यह आवश्यक नहीं कि उनका अंतिम ताप (T₁ + T₂)/2 ही हो — अंतिम ताप दोनों की ऊष्मा धारिताओं (द्रव्यमान × विशिष्ट ऊष्मा) पर निर्भर करता है; केवल समान ऊष्मा धारिता होने पर ही औसत मिलता है। (b) रासायनिक या नाभिकीय संयंत्रों में शीतलक की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होनी चाहिए, ताकि वह प्रति डिग्री ताप-वृद्धि पर अधिक ऊष्मा सोखकर संयंत्र के विभिन्न भागों को अधिक गर्म होने से रोक सके। (c) कार को चलाते-चलाते उसके टायरों में वायुदाब बढ़ जाता है, क्योंकि घर्षण और संपीडन से टायर के भीतर की वायु गर्म हो जाती है और नियत आयतन पर दाब ताप के अनुक्रमानुपाती होता है। (d) किसी बंदरगाह के समीप के शहर की जलवायु, समान अक्षांश के किसी रेगिस्तानी शहर की जलवायु से अधिक शीतोष्ण होती है — जल की विशिष्ट ऊष्मा अधिक होने से समुद्र ताप-परिवर्तनों को मंद करता है (समुद्री समीर का प्रभाव)।
- 12.4 गतिशील पिस्टन लगे सिलिंडर में मानक ताप व दाब पर 3 मोल हाइड्रोजन भरी है; सिलिंडर की दीवारें ऊष्मारोधी पदार्थ की बनी हैं और पिस्टन को बालू की परत लगाकर ऊष्मारोधी बनाया गया है: गैस को उसके आरंभिक आयतन के आधे आयतन तक रुद्धोष्म रूप से संपीडित करने पर p₂ = p₁×(V₁/V₂)^γ = p₁×2^1.4 ≈ 2.64·p₁ — अर्थात् दाब लगभग 2.64 गुना हो जाएगा (वृद्धि आरंभिक दाब की लगभग 1.64 गुना)।
- 12.5 रुद्धोष्म विधि द्वारा गैस की अवस्था परिवर्तन करते समय उसकी एक साम्यावस्था A से दूसरी साम्यावस्था B तक ले जाने में निकाय पर 22.3 J कार्य किया जाता है: रुद्धोष्म प्रक्रम में ΔQ = 0, अतः ΔU = −W_निकाय-द्वारा = +22.3 J। यदि गैस को दूसरी प्रक्रिया द्वारा अवस्था A से अवस्था B में लाने में निकाय द्वारा अवशोषित नेट ऊष्मा 9.35 cal (= 39.2 J) है, तो बाद के प्रकरण में निकाय द्वारा किया गया नेट कार्य = ΔQ − ΔU = 39.2 − 22.3 ≈ 16.9 J (ΔU अवस्था चर है, इसलिए दोनों प्रक्रमों में समान है)।
- 12.6 समान धारिता वाले दो सिलिंडर A तथा B एक-दूसरे से स्टॉपकॉक द्वारा जुड़े हैं; A में मानक ताप व दाब पर गैस भरी है, जबकि B पूर्णतः निर्वातित है; स्टॉपकॉक यकायक खोल दी जाती है: (a) सिलिंडर A तथा B में अंतिम दाब आधा (p/2) हो जाएगा (आयतन दोगुना)। (b) गैस की आंतरिक ऊर्जा में परिवर्तन शून्य होगा (मुक्त प्रसार: W = 0, Q = 0)। (c) गैस के ताप में कोई परिवर्तन नहीं होगा। (d) निकाय की माध्यिक अवस्थाएँ (अंतिम साम्यावस्था प्राप्त करने से पूर्व) उसके P-V-T पृष्ठ पर नहीं होंगी, क्योंकि मुक्त प्रसार उत्क्रमणीय/अर्ध-स्थैतिक प्रक्रम नहीं है — मध्यवर्ती अवस्थाएँ साम्यावस्थाएँ ही नहीं होतीं।
- 12.7 एक वाष्प इंजन अपने बॉयलर से प्रति मिनट 3.6×10⁹ J ऊर्जा प्रदान करता है, जो प्रति मिनट 5.4×10⁸ J कार्य देता है: इंजन की दक्षता = 5.4×10⁸/3.6×10⁹ = 0.15 (15%); प्रति मिनट अपशिष्ट ऊष्मा = 3.6×10⁹ − 5.4×10⁸ = 3.06×10⁹ J/min।
- 12.8 एक हीटर किसी निकाय को 100 W की दर से ऊष्मा प्रदान करता है; यदि निकाय 75 J/s की दर से कार्य करता है, तो प्रथम नियम से आंतरिक ऊर्जा की वृद्धि की दर = 100 − 75 = 25 J/s।
- 12.9 चित्र 12.13 में: D = (2.0 m³, 600 N/m²), E = (5.0 m³, 300 N/m²), F = (2.0 m³, 300 N/m²)। D से E तक रेखीय प्रक्रम में गैस द्वारा किया गया कार्य = समलंब का क्षेत्रफल = ½×(600 + 300)×(5.0 − 2.0) = 1350 J; E से F तक समदाबी संपीडन में कार्य = 300×(2.0 − 5.0) = −900 J — अतः गैस द्वारा D से E तथा वहाँ से F तक कुल किया गया कार्य = 1350 − 900 = 450 J।
- 12.10 खाद्य पदार्थ को प्रशीतक के अंदर रखने पर वह उसे 9 °C पर बनाए रखता है; यदि कमरे का ताप 36 °C है, तो प्रशीतक के निष्पादन गुणांक का आकलन: कार्नो प्रशीतक के लिए α = T₂/(T₁ − T₂) = 282/(309 − 282) = 282/27 ≈ 10.4।
- प्रथम नियम: ΔQ = ΔU + ΔW; U अवस्था चर है, Q और W पथ पर निर्भर हैं।
- रुद्धोष्म में pV^γ = नियत; मुक्त प्रसार में W = 0, Q = 0, ΔU = 0, ताप नियत।
- इंजन दक्षता η = 1 − Q₂/Q₁; कार्नो दक्षता केवल तापों पर निर्भर करती है।
- प्रशीतक का गुणांक α = Q₂/W; कार्नो प्रशीतक के लिए T₂/(T₁ − T₂)।
- P-V आरेख के नीचे का क्षेत्रफल ही गैस द्वारा किया गया कार्य है।

