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Class 11 • Physics • Bhautiki Bhag-2

Chapter 14: तरंगें

प्रगामी तरंगें, अप्रगामी तरंगें, विस्पंद, डॉप्लर प्रभाव और ध्वनि — पुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों सहित।

Original notes — ready Educational Galaxy के अपने शब्दों में Bhautiki Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

Print: browser से PDF save कर सकते हैं। यह कोई textbook PDF नहीं है।

तरंगें — EG के अपने शब्दों में सार

Book: Bhautiki Bhag-2 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 11 Physics)  |  Chapter 14  |  Medium: हिंदी (English technical शब्द साथ में)

तरंग क्या है

तरंग वह विक्षोभ है जो ऊर्जा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है, बिना पदार्थ को साथ ले जाए।

अनुप्रस्थ तरंग में कण तरंग की दिशा के लंबवत दोलन करते हैं, जैसे डोरी की तरंग। अनुदैर्ध्य तरंग में कण तरंग की दिशा में ही दोलन करते हैं, जैसे ध्वनि तरंग।

तरंग की राशियाँ

तरंगदैर्ध्य λ दो लगातार शिखरों के बीच की दूरी है। आवृत्ति ν प्रति सेकंड तरंगों की संख्या है और चाल v = νλ होती है।

ध्वनि की चाल माध्यम पर निर्भर करती है — ठोस में सबसे अधिक, फिर द्रव में, फिर गैस में। ताप बढ़ने पर गैस में ध्वनि की चाल बढ़ती है।

अध्यारोपण, विस्पंद और डॉप्लर प्रभाव

जब दो तरंगें मिलती हैं, तो उनका अध्यारोपण होता है — समान कला में मिलने पर आयाम बढ़ता है और विपरीत कला में घटता है।

लगभग समान आवृत्ति की दो ध्वनियों के मिलने से विस्पंद सुनाई देते हैं। स्रोत या श्रोता के गति करने पर आवृत्ति में बदलाव डॉप्लर प्रभाव कहलाता है — इसी से एंबुलेंस की आवाज़ आते समय ऊँची और जाते समय नीची लगती है।

इस अध्याय का विचार: तरंग वह विक्षोभ है जो माध्यम के कणों के दोलन के बिना स्वयं ऊर्जा और संवेग को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है। प्रगामी तरंग चलती है (y = f(x ± vt)); अप्रगामी तरंग ठहरती है (निस्पंद और प्रस्पंद); विस्पंद दो निकट आवृत्तियों के अध्यारोपण से बनते हैं; डॉप्लर प्रभाव स्रोत/प्रेक्षक की गति से आवृत्ति बदलता है।

पुस्तक की संरचना: अध्याय तरंग गति की परिभाषा से शुरू होकर अनुप्रस्थ/अनुदैर्ध्य तरंगें, प्रगामी तरंग का विस्थापन संबंध, तरंग की चाल, अध्यारोपण का सिद्धांत, तरंगों का परावर्तन, विस्पंद और डॉप्लर प्रभाव तक जाता है।

15.1–15.2 तरंग गति और तरंगों के प्रकार

तरंग गति: माध्यम का विक्षोभ एक स्थान से दूसरे स्थान तक संचरित होता है, जबकि माध्यम के कण अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर ही दोलन करते हैं। अनुप्रस्थ तरंग: कणों का दोलन संचरण की दिशा के लंबवत् होता है (जैसे डोरी की तरंग)। अनुदैर्ध्य तरंग: कणों का दोलन संचरण की दिशा के अनुदिश होता है (जैसे ध्वनि तरंग)। ठोसों में दोनों प्रकार की तरंगें संचरित हो सकती हैं (अपरूपण गुणांक + आयतन गुणांक); गैसों में केवल अनुदैर्ध्य तरंगें (केवल आयतन गुणांक, अपरूपण गुणांक नहीं)।

15.3–15.4 प्रगामी तरंग और तरंग की चाल

प्रगामी तरंग का विस्थापन संबंध: y(x, t) = a·sin(kx ∓ ωt + φ) — चिह्न − हो तो तरंग +x दिशा में, + हो तो −x दिशा में चलती है। तरंग संख्या k = 2π/λ; कोणीय आवृत्ति ω = 2πν; चाल v = νλ = ω/k। डोरी पर अनुप्रस्थ तरंग की चाल v = √(T/μ); गैस में ध्वनि की चाल v = √(γP/ρ) — दाब पर निर्भर नहीं करती (क्योंकि दाब बढ़ने पर घनत्व भी उसी अनुपात में बढ़ता है), तापमान के साथ √T के अनुसार बढ़ती है, आर्द्रता के साथ बढ़ती है (नम वायु हल्की होती है)।

15.5–15.6 अध्यारोपण और परावर्तन

अध्यारोपण का सिद्धांत: जब दो या अधिक तरंगें एक साथ किसी बिंदु से गुजरती हैं, तो परिणामी विस्थापन उनके विस्थापनों का सदिश योग होता है। विपरीत दिशाओं में चलती समान तरंगों के अध्यारोपण से अप्रगामी तरंग बनती है — निस्पंद (शून्य आयाम के बिंदु) और प्रस्पंद (अधिकतम आयाम के बिंदु)। दृढ़ सिरे से परावर्तन पर कला में π का परिवर्तन होता है; मुक्त सिरे से परावर्तन पर कला अपरिवर्तित रहती है।

15.7–15.8 विस्पंद और डॉप्लर प्रभाव

विस्पंद: लगभग समान आवृत्तियों (ν₁, ν₂) की दो तरंगों के अध्यारोपण से ध्वनि की तीव्रता समय के साथ बढ़ती-घटती है; विस्पंद आवृत्ति = |ν₁ − ν₂|। डॉप्लर प्रभाव: स्रोत के प्रेक्षक की ओर आने पर आभासी आवृत्ति बढ़ती है (ν′ = ν·v/(v − v_s)), दूर जाने पर घटती है (ν′ = ν·v/(v + v_s)); प्रेक्षक की गति भी आवृत्ति बदलती है (ν′ = ν·(v ± v₀)/v); वायु की गति (पवन) तरंग की चाल बदलती है, आवृत्ति नहीं — इसलिए पवन की स्थिति प्रेक्षक की गति की स्थिति के समतुल्य नहीं है।

तालिका / चार्ट — एक नज़र में

तरंगकणों का दोलन
अनुप्रस्थतरंग दिशा के लंबवत
अनुदैर्ध्यतरंग दिशा के समांतर

तरंगें — अनुप्रस्थ और अनुदैर्ध्य

चित्र 1: चित्र 1 में तरंग के स्रोत से श्रोता तक पहुँचने का क्रम दिखाया गया है।

तरंगें — याद रखने योग्य बातें

चित्र 2: चित्र 2 में इस अध्याय की चार सबसे ज़रूरी बातें संक्षेप में दी गई हैं।

अनुप्रस्थ तरंग: तरंगदैर्घ्य और आयाम

नया चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): अनुप्रस्थ तरंग: तरंगदैर्घ्य और आयाम

मुख्य शब्द / Key Terms

  • तरंगदैर्ध्य: दो लगातार शिखरों की दूरी।
  • आवृत्ति: प्रति सेकंड तरंगों की संख्या।
  • आयाम: कण का अधिकतम विस्थापन।
  • विस्पंद: आवृत्ति के अंतर से बनने वाली धड़कन।
  • डॉप्लर प्रभाव: गति के कारण आवृत्ति में बदलाव।
  • प्रगामी तरंग: y = a·sin(kx ∓ ωt + φ); चाल v = νλ = ω/k।
  • डोरी: v = √(T/μ); ध्वनि: v = √(γP/ρ) — दाब पर निर्भर नहीं, √T पर निर्भर।
  • अप्रगामी तरंग: निस्पंद (शून्य आयाम) और प्रस्पंद (अधिकतम आयाम); दृढ़ सिरे पर कला में π का परिवर्तन।
  • विस्पंद: आवृत्ति = |ν₁ − ν₂|; डॉप्लर: स्रोत निकट आए तो आवृत्ति बढ़े, दूर जाए तो घटे।
  • ध्वनि में विस्थापन निस्पंद = दाब प्रस्पंद और विस्थापन प्रस्पंद = दाब निस्पंद होता है।

याद रखें

  • तरंग चाल v = νλ होती है।
  • ध्वनि निर्वात में नहीं चल सकती।
  • ध्वनि की चाल ठोस में सबसे अधिक होती है।
  • अध्यारोपण में ऊर्जा संरक्षित रहती है।
  • डॉप्लर प्रभाव में स्रोत की आवृत्ति नहीं बदलती, सुनाई देने वाली बदलती है।

परीक्षा टिप / आम गलती

आम गलती: ध्वनि की चाल को हर माध्यम में समान मान लेना। ध्वनि की चाल माध्यम के घनत्व और प्रत्यास्थता पर निर्भर करती है।

जानकारी — कण का वेग ≠ तरंग की चाल

किसी बिंदु पर माध्यम के कण का अनुप्रस्थ वेग (∂y/∂t) तरंग के संचरण की चाल (v = ω/k) से बिल्कुल भिन्न राशि है। कण केवल अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर दोलन करता है; तरंग का रूप आगे बढ़ता है।

चेतावनी — पवन और प्रेक्षक की गति समतुल्य नहीं हैं

पवन तरंग की चाल बदलती है, आवृत्ति नहीं; प्रेक्षक की गति आवृत्ति बदलती है, चाल नहीं (माध्यम के सापेक्ष)। इसलिए 'पवन चल रही है' वाली स्थिति 'प्रेक्षक दौड़ रहा है' वाली स्थिति के समतुल्य नहीं है।

टिप — विस्पंद से आवृत्ति का अंतर निकालो

यदि एक स्वरित्र की आवृत्ति ज्ञात है और विस्पंद आवृत्ति मापी गई है, तो दूसरी आवृत्ति दो संभावित मानों में से एक होती है — तनाव बढ़ाने/घटाने पर विस्पंद के बढ़ने/घटने से सही मान चुनो (जैसे प्रश्न 15.18 में)।

अभ्यास प्रश्न — खुद करके देखें

  1. अनुप्रस्थ और अनुदैर्ध्य तरंग में अंतर बताइए। संकेत: अनुप्रस्थ में कण लंबवत, अनुदैर्ध्य में समांतर दोलन करते हैं।
  2. तरंग चाल का सूत्र लिखिए। संकेत: v = νλ।
  3. ध्वनि निर्वात में क्यों नहीं चलती? संकेत: क्योंकि उसे माध्यम के कण चाहिए।
  4. विस्पंद क्या हैं? संकेत: लगभग समान आवृत्ति की ध्वनियों के मिलने से बनने वाली धड़कन।
  5. डॉप्लर प्रभाव का एक उदाहरण दीजिए। संकेत: आती एंबुलेंस की आवाज़ ऊँची लगना।

मुख्य प्रश्नोत्तर — Core Q&A

  1. डोरी की तरंग अनुप्रस्थ क्यों होती है? उत्तर: क्योंकि डोरी के कण संचरण की दिशा के लंबवत् दोलन करते हैं; ध्वनि अनुदैर्ध्य होती है क्योंकि वायु के कण संचरण की दिशा के अनुदिश संपीडन-विरलन करते हैं।
  2. ध्वनि की चाल दाब पर निर्भर क्यों नहीं करती? उत्तर: क्योंकि नियत ताप पर दाब बढ़ने पर घनत्व भी उसी अनुपात में बढ़ता है — अनुपात P/ρ नियत रहता है, इसलिए v = √(γP/ρ) अपरिवर्तित रहती है।
  3. गैसों में केवल अनुदैर्ध्य तरंगें क्यों चलती हैं? उत्तर: क्योंकि गैसों में अपरूपण गुणांक नहीं होता — वे केवल आयतन परिवर्तन का प्रतिरोध करती हैं, आकार परिवर्तन का नहीं।
  4. विस्थापन निस्पंद दाब प्रस्पंद क्यों होता है? उत्तर: क्योंकि दाब-विचरण विस्थापन के स्थानिक अवकलज के अनुक्रमानुपाती है — जहाँ विस्थापन शून्य है वहाँ अवकलज अधिकतम है, और जहाँ विस्थापन अधिकतम है वहाँ अवकलज शून्य है।
  5. परिमित ध्वनि-स्पंद की कोई निश्चित आवृत्ति क्यों नहीं होती? उत्तर: क्योंकि परिमित स्पंद अनेक आवृत्तियों का अध्यारोपण होता है — केवल उसकी संचरण चाल निश्चित होती है।

उत्तर सहित प्रश्न — बोर्ड-पैटर्न अभ्यास

ये Educational Galaxy के अपने बोर्ड-पैटर्न अभ्यास प्रश्न हैं, बोर्ड प्रश्नों की शैली में लिखे गए हैं। ये असली पिछले वर्षों के प्रश्न होने का दावा नहीं करते।

  1. आवृत्ति दोगुनी हो तो तरंगदैर्ध्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उत्तर: आधी हो जाएगी, यदि चाल स्थिर रहे।
  2. ध्वनि की चाल ठोस में अधिक क्यों होती है? उत्तर: क्योंकि ठोस के कण पास-पास और दृढ़ता से जुड़े होते हैं।
  3. अध्यारोपण में आयाम कब बढ़ता है? उत्तर: जब तरंगें समान कला में मिलती हैं।
  4. डॉप्लर प्रभाव में क्या बदलता है? उत्तर: सुनाई देने वाली आवृत्ति; स्रोत की आवृत्ति नहीं।
  5. ताप बढ़ने पर गैस में ध्वनि की चाल कैसी होगी? उत्तर: बढ़ जाएगी।

पुस्तक के अभ्यास प्रश्न — Extension Q&A (मुख्य अभ्यास)

नीचे के प्रश्न पुस्तक के अभ्यास (मुख्य भाग) के प्रश्नों पर आधारित हैं, EG के अपने शब्दों में लिखे गए हैं; उत्तर स्वयं जाँचकर दिए गए हैं।

  1. 15.1 2.50 kg द्रव्यमान की 20 cm लंबी तनित डोरी पर 200 N बल का तनाव है: रैखिक द्रव्यमान घनत्व μ = 2.50/0.20 = 12.5 kg/m; डोरी पर अनुप्रस्थ तरंग की चाल v = √(200/12.5) = 4 m/s — अतः डोरी के एक सिरे को दिया गया अनुप्रस्थ झटका दूसरे सिरे तक 0.20/4 = 0.05 s में पहुँचेगा।
  2. 15.2 300 m ऊँची मीनार के शिखर से गिराया गया पत्थर मीनार के आधार पर बने तालाब के पानी से टकराता है; वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s है: पत्थर के गिरने का समय = √(2×300/9.8) ≈ 7.82 s; ध्वनि के लौटने का समय = 300/340 ≈ 0.88 s — अतः पत्थर के टकराने की ध्वनि मीनार के शिखर पर पत्थर गिराने के लगभग 8.7 s बाद सुनाई देगी।
  3. 15.3 12.0 m लंबे स्टील के तार का द्रव्यमान 2.10 kg है: μ = 2.10/12.0 = 0.175 kg/m; तार पर अनुप्रस्थ तरंग की चाल 20 °C पर शुष्क वायु में ध्वनि की चाल (343 m/s) के बराबर हो, इसके लिए तनाव T = μv² = 0.175×343² ≈ 2.06×10⁴ N होना चाहिए।
  4. 15.4 सूत्र v = √(γP/ρ) का उपयोग करके स्पष्ट करना है कि वायु में ध्वनि की चाल: (a) दाब पर निर्भर नहीं करती — नियत ताप पर दाब बढ़ने पर घनत्व भी उसी अनुपात में बढ़ता है, अनुपात P/ρ नियत रहता है; (b) ताप के साथ बढ़ती है — v ∝ √T (परम ताप के वर्गमूल के अनुक्रमानुपाती); (c) आर्द्रता के साथ बढ़ती है — जलवाष्प शुष्क वायु से हल्की होती है, इसलिए नम वायु का घनत्व कम होता है और चाल अधिक हो जाती है।
  5. 15.5 एक विमा में कोई प्रगामी तरंग फलन y = f(x, t) द्वारा निरूपित की जाती है जिसमें x तथा t को x − vt अथवा x + vt अर्थात् y = f(x ± vt) संयोजन में प्रकट होना चाहिए — इसका प्रतिलोम भी सत्य है: कोई भी फलन जो (x ± vt) के रूप में लिखा जा सके, प्रगामी तरंग को निरूपित करता है: (a) (x − vt)² — हाँ (धनात्मक x दिशा में चलती तरंग); (b) log[(x + vt)/x₀] — हाँ (ऋणात्मक x दिशा में चलती तरंग); (c) 1/(x + vt) — हाँ (ऋणात्मक x दिशा में चलती तरंग) — (b) और (c) x = −vt पर विचित्र (singular) हैं, इसलिए वे आदर्शीकृत गणितीय रूप हैं, संपूर्ण रेखा पर भौतिक नहीं।
  6. 15.6 कोई चमगादड़ वायु में 1000 kHz आवृत्ति की पराश्रव्य ध्वनि उत्सर्जित करता है; यह ध्वनि जल के पृष्ठ से टकराती है; वायु तथा जल में ध्वनि की चाल क्रमशः 340 m/s तथा 1486 m/s है: (a) परावर्तित ध्वनि (वायु में): आवृत्ति अपरिवर्तित 1000 kHz, तरंगदैर्घ्य = 340/10⁶ = 0.34 mm। (b) पारगमित ध्वनि (जल में): आवृत्ति अपरिवर्तित 1000 kHz, तरंगदैर्घ्य = 1486/10⁶ ≈ 1.49 mm — परावर्तन/अपवर्तन पर आवृत्ति नहीं बदलती, केवल तरंगदैर्घ्य बदलती है।
  7. 15.7 किसी अस्पताल में ऊतकों में ट्यूमरों का पता लगाने के लिए पराश्रव्य स्कैनर का प्रयोग किया जाता है; उस ऊतक में ध्वनि की चाल 1.7 km/s है; स्कैनर की प्रचालन आवृत्ति 4.2 MHz है: ऊतक में ध्वनि की तरंगदैर्घ्य = 1700/(4.2×10⁶) ≈ 4.0×10⁻⁴ m (0.40 mm)।
  8. 15.8 किसी डोरी पर कोई अनुप्रस्थ गुणावृत्ति तरंग का वर्णन y(x, t) = 3.0 sin(36t + 0.018x + π/4) द्वारा किया जाता है (x तथा y cm में, t s में; x की धनात्मक दिशा बाएँ से दाएँ है): (a) यह प्रगामी तरंग है — कला (36t + 0.018x) नियत रखने पर t बढ़ने से x घटता है, अतः तरंग दाएँ से बाएँ (ऋणात्मक x दिशा में) चलती है; चाल = ω/k = 36/0.018 = 2000 cm/s = 20 m/s। (b) आयाम = 3.0 cm; आवृत्ति = 36/2π ≈ 5.73 Hz। (c) उद्गम के समय आरंभिक कला = π/4। (d) इस तरंग में दो क्रमागत शिखरों के बीच की न्यूनतम दूरी = λ = 2π/0.018 ≈ 349 cm (3.49 m)।
  9. 15.9 प्रश्न 15.8 में वर्णित तरंग के लिए x = 0 cm, 2 cm तथा 4 cm के लिए विस्थापन (y) और समय (t) के बीच ग्राफ़ आलेखित करने पर: तीनों ग्राफ़ ज्या-वक्र (sinusoidal) होते हैं, जिनका आयाम (3.0 cm) और आवृत्ति (5.73 Hz) समान है, परंतु कला भिन्न है — x = 0 पर कला π/4, x = 2 cm पर (0.036 + π/4), x = 4 cm पर (0.072 + π/4) — अतः प्रगामी तरंग में दोलनी गति एक बिंदु से दूसरे बिंदु पर केवल कला में भिन्न होती है, आयाम या आवृत्ति में नहीं।
  10. 15.10 प्रगामी गुणावृत्ति तरंग y(x, t) = 2.0 cos 2π(10t − 0.0080x + 0.35) (x तथा y m में, t s में) के लिए, उन दो दोलनी बिंदुओं के बीच कलांतर: तरंगदैर्घ्य λ = 1/0.0080 = 125 m; कलांतर Δφ = 2π×0.0080×Δx: (a) 4 m दूरी पर: Δφ = 0.064π rad ≈ 0.20 rad; (b) 0.5 m दूरी पर: Δφ = 0.008π rad ≈ 0.025 rad; (c) λ/2 दूरी पर: Δφ = π rad; (d) 3λ/4 दूरी पर: Δφ = 3π/2 rad।
  11. 15.11 दोनों सिरों पर परिबद्ध किसी तनित डोरी पर अनुप्रस्थ विस्थापन y(x, t) = 0.06 sin(2πx/3) cos(120πt) है (x तथा y m में, t s में); डोरी की लंबाई 1.5 m है, उसकी लगति 3.0×10⁻² kg है: (a) यह फलन अप्रगामी तरंग को निरूपित करता है (स्थानिक और कालिक भागों का गुणनफल)। (b) विपरीत दिशाओं में गमन करती दो तरंगों के अध्यारोपण के रूप में: y = 0.03 sin(2πx/3 + 120πt) + 0.03 sin(2πx/3 − 120πt) — प्रत्येक तरंग की तरंगदैर्घ्य = 3 m, आवृत्ति = 60 Hz, चाल = 180 m/s। (c) डोरी में तनाव: μ = 3.0×10⁻²/1.5 = 0.02 kg/m → T = μv² = 0.02×180² = 648 N।
  12. 15.12 (i) प्रश्न 15.11 में वर्णित डोरी पर तरंग के लिए: (a) आवृत्ति समान है — डोरी के सभी बिंदु 60 Hz से कंपन करते हैं; (b) कला समान नहीं है — निस्पंद के आर-पार कला में π का अंतर आ जाता है (निस्पंदों के बीच के बिंदु समकला में, निस्पंद के दोनों ओर के बिंदु विपरीत कला में कंपन करते हैं); (c) आयाम समान नहीं है — आयाम 0.06·|sin(2πx/3)| के अनुसार बदलता है (निस्पंदों पर शून्य, प्रस्पंदों पर अधिकतम)। (ii) एक सिरे से 0.375 m दूर के बिंदु का आयाम = 0.06×sin(2π×0.375/3) = 0.06×sin(π/4) ≈ 0.042 m (4.2 cm)।
  13. 15.13 किसी प्रत्यास्थ तरंग (अनुप्रस्थ अथवा अनुदैर्घ्य) के विस्थापन को निरूपित करने वाले x तथा t के फलन: (a) y = 2 cos(3x) sin 10t — (ii) अप्रगामी तरंग (स्थानिक × कालिक गुणनफल)। (b) y = 2√(x − vt) — (i) प्रगामी तरंग (यह (x − vt) का फलन है)। (c) y = 3 sin(5x − 0.5t) + 4 cos(5x − 0.5t) — (i) प्रगामी तरंग (समान ω, k के दो पदों का योग एकल प्रगामी तरंग 5·sin(5x − 0.5t + φ) के रूप में लिखा जा सकता है)। (d) y = cos x sin t + cos 2x sin 2t — (iii) इनमें से किसी भी तरंग को नहीं (भिन्न आवृत्तियों की दो अप्रगामी तरंगों का योग — न एकल प्रगामी, न एकल अप्रगामी तरंग)।
  14. 15.14 दो दृढ़ टेकों के बीच तनित तार अपनी मूल विधा में 45 Hz आवृत्ति से कंपन करता है; तार का द्रव्यमान 3.5×10⁻² kg तथा रैखिक द्रव्यमान घनत्व 4.0×10⁻² kg/m है: तार की लंबाई = 3.5×10⁻²/4.0×10⁻² = 0.875 m। (a) मूल विधा: ν = v/(2L) → तार पर अनुप्रस्थ तरंग की चाल = 2×0.875×45 ≈ 79 m/s। (b) तार में तनाव = μv² = 0.04×78.75² ≈ 2.5×10² N।
  15. 15.15 एक सिरे पर खुली तथा दूसरे सिरे पर चलायमान पिस्टन लगी 1 m लंबी नलिका, 340 Hz आवृत्ति के स्वरित्र के साथ, तब अनुनाद दर्शाती है जब नलिका में वायु काॅलम 25.5 cm अथवा 79.3 cm होता है: क्रमागत अनुनादों का अंतर = λ/2 = 79.3 − 25.5 = 53.8 cm → λ = 1.076 m — अतः प्रयोगशाला के ताप पर वायु में ध्वनि की चाल = 340×1.076 ≈ 366 m/s (कोर-प्रभाव को नगण्य मानकर)।
  16. 15.16 100 cm लंबी स्टील-रॉड अपने मध्य-बिंदु पर परिबद्ध है; इसके अनुदैर्घ्य कंपनों की मूल आवृत्ति 2.53 kHz है: मध्य-बिंदु पर निस्पंद और सिरों पर प्रस्पंद होने से L = λ/2 → λ = 2.0 m — अतः स्टील में ध्वनि की चाल = 2530×2.0 = 5060 m/s।
  17. 15.17 20 cm लंबाई के पाइप का एक सिरा बंद है; 430 Hz आवृत्ति के स्रोत द्वारा इस पाइप की कौन-सी गुणावृत्ति विधा अनुनाद द्वारा उत्तेजित की जाती है? बंद पाइप की विधाएँ: (2n+1)×340/(4×0.20) = (2n+1)×425 Hz — मूल विधा 425 Hz ≈ 430 Hz, अतः मूल विधा उत्तेजित होती है। यदि पाइप के दोनों सिरे खुले हों तो विधाएँ n×340/(2×0.20) = n×850 Hz होंगी — 430 Hz किसी भी विधा से मेल नहीं खाता, अतः अनुनाद नहीं होगा (वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s है)।
  18. 15.18 सितार की दो डोरियाँ A तथा B एक साथ 'गा' स्वर बजा रही हैं तथा थोड़ी-सी बेसुरी होने के कारण 6 Hz आवृत्ति के विस्पंद उत्पन्न कर रही हैं; डोरी A का तनाव कुछ घटाने पर विस्पंद की आवृत्ति घटकर 3 Hz रह जाती है; A की मूल आवृत्ति 324 Hz है: तनाव घटाने पर A की आवृत्ति घटती है और विस्पंद घटे हैं — अतः B की आवृत्ति A से कम थी: B की आवृत्ति = 324 − 6 = 318 Hz (तनाव घटाने के बाद A की आवृत्ति 321 Hz हो जाती है, विस्पंद 3 Hz — संगत)।
  19. 15.19 (a) किसी ध्वनि तरंग में विस्थापन निस्पंद दाब प्रस्पंद होता है और विस्थापन प्रस्पंद दाब निस्पंद होता है — क्योंकि दाब-विचरण विस्थापन के स्थानिक अवकलज के अनुक्रमानुपाती है: जहाँ विस्थापन शून्य है वहाँ अवकलज अधिकतम है, और जहाँ विस्थापन अधिकतम है वहाँ अवकलज शून्य है। (b) आँख न होने पर भी चमगादड़ अवरोधों की दूरी, दिशा, प्रकृति तथा आकार सुमिश्चित कर लेते हैं — प्रतिध्वनि-स्थान-निर्धारण (echolocation) से: उत्सर्जित पराश्रव्य ध्वनि की प्रतिध्वनि का समय दूरी बताता है, दोनों कानों में तीव्रता/समय का अंतर दिशा बताता है, प्रतिध्वनि का स्वरूप प्रकृति और आकार बताता है। (c) वायलिन तथा सितार के स्वरों की आवृत्तियाँ समान होने पर भी हम दोनों से उत्पन्न स्वरों में भेद कर लेते हैं — क्योंकि स्वरों की गुणता (timbre) भिन्न होती है: अधिस्वरकों (harmonics) का मिश्रण और तरंग-रूप भिन्न होते हैं, कान इसी से भेद करता है। (d) ठोस अनुदैर्घ्य तथा अनुप्रस्थ दोनों प्रकार की तरंगों का पोषण कर सकते हैं जबकि गैसों में केवल अनुदैर्ध्य तरंगें ही संचरित हो सकती हैं — क्योंकि ठोसों में अपरूपण गुणांक और आयतन गुणांक दोनों होते हैं, गैसों में केवल आयतन गुणांक होता है। (e) परिक्षेपी माध्यम में संचरण के समय स्पंद की आकृति विकृत हो जाती है — क्योंकि विभिन्न आवृत्ति-घटकों की चाल भिन्न होती है, इसलिए स्पंद फैलता और आकृति बदलता है।
  20. 15.20 रेलवे स्टेशन के बाह्य सिग्नल पर खड़ी कोई रेलगाड़ी शांत वायु में 400 Hz आवृत्ति की सीटी बजाती है: (i) प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े प्रेक्षक के लिए सीटी की आवृत्ति: (a) रेलगाड़ी 10 m/s चाल से प्लेटफ़ॉर्म की ओर गतिशील हो तो ν′ = 400×340/(340−10) ≈ 412 Hz; (b) रेलगाड़ी 10 m/s चाल से प्लेटफ़ॉर्म से दूर जा रही हो तो ν′ = 400×340/(340+10) ≈ 389 Hz। (ii) दोनों ही प्रकरणों में ध्वनि की चाल 340 m/s ही रहती है — स्रोत की गति माध्यम में तरंग की चाल नहीं बदलती (शांत वायु में ध्वनि की चाल 340 m/s लीजिए)।
  21. 15.21 स्टेशन यार्ड में खड़ी कोई रेलगाड़ी शांत वायु में 400 Hz आवृत्ति की सीटी बजा रही है; तभी 10 m/s चाल से यार्ड से स्टेशन की ओर वायु बहने लगती है: स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े किसी प्रेक्षक के लिए ध्वनि की आवृत्ति 400 Hz ही रहती है (स्रोत और प्रेक्षक दोनों भूमि के सापेक्ष स्थिर हैं), तरंगदैर्घ्य = 350/400 = 0.875 m और चाल = 340 + 10 = 350 m/s। यह स्थिति तथ्यतः उस स्थिति के समरूप नहीं है जिसमें वायु शांत हो तथा प्रेक्षक 10 m/s चाल से यार्ड की ओर दौड़ रहा हो — उस स्थिति में आवृत्ति 412 Hz होती (और तरंगदैर्घ्य 0.85 m) — पवन चाल बदलती है, प्रेक्षक की गति आवृत्ति बदलती है।

पुस्तक के अतिरिक्त अभ्यास प्रश्न — Extension Q&A (अतिरिक्त भाग)

ये प्रश्न पुस्तक के ‘अतिरिक्त अभ्यास’ भाग से हैं, EG के अपने शब्दों में।

  1. 15.22 किसी डोरी पर कोई प्रगामी गुणावृत्ति तरंग y(x, t) = 7.5 sin(0.0050x + 12t + π/4) है (x cm में, t s में): तरंग −x दिशा में 12/0.0050 = 2400 cm/s = 24 m/s चाल से चलती है; तरंगदैर्घ्य = 2π/0.0050 ≈ 1257 cm। (a) x = 1 cm तथा t = 1 s पर किसी बिंदु का विस्थापन: कला = 0.0050 + 12 + π/4 ≈ 12.79 rad ≡ 0.224 rad (4π घटाकर) → y ≈ 7.5×sin(0.224) ≈ 1.7 cm; दोलन की चाल = ∂y/∂t = 90×cos(0.224) ≈ 88 cm/s — यह चाल तरंग संचरण की चाल (2400 cm/s) के बराबर नहीं है। (b) डोरी के उन बिंदुओं की अवस्थिति जिनका अनुप्रस्थ विस्थापन तथा चाल उतनी ही है जितनी x = 1 cm पर स्थित बिंदु की (t = 1 s पर): तरंग −x दिशा में चलती है, अतः वही कला समय t पर x = 1 − 2400(t − 1) cm पर मिलेगी — t = 2 s पर −2399 cm, t = 5 s पर −9599 cm, t = 11 s पर −23999 cm (तथा इनमें तरंगदैर्घ्य के पूर्ण गुणज जोड़ने पर भी वही कला मिलती है)।
  2. 15.23 ध्वनि का कोई सीमित स्पंद (उदाहरणार्थ सीटी की 'पिप') माध्यम में भ्रमण करता है: (a) इस स्पंद की कोई निश्चित (i) आवृत्ति नहीं है, (ii) तरंगदैर्घ्य नहीं है — परिमित स्पंद अनेक आवृत्तियों का अध्यारोपण होता है; (iii) संचरण की चाल निश्चित है — माध्यम की तरंग-चाल। (b) यदि स्पंद दर 1 स्पंद प्रति 20 सेकंड है, तो सीटी द्वारा उत्पन्न स्वर की आवृत्ति (1/20) Hz अथवा 0.05 Hz नहीं है — स्पंद की पुनरावृत्ति दर स्वर की आवृत्ति नहीं है; स्वर की आवृत्ति प्रत्येक स्पंद के भीतर के दोलनों से तय होती है, स्पंदों के अंतराल से नहीं।
  3. 15.24 8.0×10⁻³ kg/m रैखिक द्रव्यमान घनत्व की किसी लंबी डोरी का एक सिरा 256 Hz आवृत्ति के विद्युत चालित स्वरित्र द्विभुज से जुड़ा है; डोरी का दूसरा सिरा किसी स्थिर घिरनी के ऊपर गुजरता हुआ किसी तुला के पलड़े से बँधा है जिस पर 90 kg के बाट लटके हैं: तनाव = 90×9.8 = 882 N; तरंग-चाल = √(882/0.008) ≈ 332 m/s; कोणीय आवृत्ति ω = 2π×256 ≈ 1608 rad/s; तरंग संख्या k = ω/v ≈ 4.84 rad/m। t = 0 पर डोरी के बाएँ सिरे (x = 0) पर अनुप्रस्थ विस्थापन शून्य (y = 0) है तथा वह y की धनात्मक दिशा के अनुदिश गतिशील है; तरंग का आयाम 5.0 cm है — अतः डोरी पर इस तरंग का वर्णन करने वाला अनुप्रस्थ विस्थापन y = 5.0 sin(1608t − 4.84x) cm है (x m में, t s में; तरंग घिरनी की ओर, +x दिशा में चलती है)।
  4. 15.25 किसी पनडुब्बी से आबद्ध कोई 'सोनार' निकाय 40.0 kHz आवृत्ति पर प्रचालन करता है; कोई शत्रु-पनडुब्बी 360 km/h (= 100 m/s) चाल से इस सोनार की ओर गतिशील है; जल में ध्वनि की चाल 1450 m/s है: शत्रु-पनडुब्बी तक पहुँचने वाली आवृत्ति = 40000×(1450+100)/1450 ≈ 42759 Hz; परावर्तित ध्वनि (शत्रु-पनडुब्बी अब गतिशील स्रोत है) की आवृत्ति = 42759×1450/(1450−100) ≈ 45.9 kHz — यही आवृत्ति सोनार द्वारा सुनी जाएगी।
  5. 15.26 भूकंप पृथ्वी के भीतर तरंगें उत्पन्न करते हैं; गैसों के विपरीत, पृथ्वी अनुप्रस्थ (S) तथा अनुदैर्घ्य (P) दोनों प्रकार की तरंगों की अनुभूति कर सकती है; S तरंगों की प्रतिरूपी चाल लगभग 4.0 km/s, तथा P तरंगों की प्रतिरूपी चाल लगभग 8.0 km/s है; कोई भूकंप-लेखी किसी भूकंप की P तथा S तरंगों को रिकॉर्ड करता है; पहली P तरंग पहली S तरंग की तुलना में 4 मिनट पहले पहुँचती है: दूरी d के लिए d/4 − d/8 = 240 s → d = 1920 km — भूकंप घटित होने वाले स्थान की दूरी लगभग 1920 km है (तरंगें सरल रेखा में गमन करती हैं, यह मानकर)।
  6. 15.27 कोई चमगादड़ किसी गुफा में फड़फड़ाते हुए, पराश्रव्य ध्वनि उत्पन्न करते हुए, उड़ रहा है; चमगादड़ द्वारा उत्सर्जित पराश्रव्य ध्वनि की आवृत्ति 40 kHz है; किसी दीवार की ओर सीधी उड़ान भरते समय चमगादड़ की चाल ध्वनि की चाल की 0.03 गुनी है: दीवार से परावर्तित ध्वनि की आवृत्ति चमगादड़ द्वारा सुनी जाएगी: ν′ = 40000×(1 + 0.03)/(1 − 0.03) = 40000×1.03/0.97 ≈ 42.5 kHz (दीवार पर पड़ने वाली आवृत्ति 41200 Hz, परावर्तित ध्वनि गतिशील प्रेक्षक — चमगादड़ — तक 42474 Hz पर पहुँचती है)।
Recap — याद रखने वाली बातें
  • प्रगामी तरंग y = f(x ± vt) है; कण का वेग तरंग की चाल से भिन्न है।
  • डोरी: v = √(T/μ); ध्वनि: v = √(γP/ρ) — दाब पर निर्भर नहीं, तापमान और आर्द्रता पर निर्भर।
  • अप्रगामी तरंग: निस्पंद/प्रस्पंद; विस्थापन निस्पंद = दाब प्रस्पंद।
  • विस्पंद आवृत्ति = |ν₁ − ν₂|; डॉप्लर: स्रोत निकट → आवृत्ति बढ़े, दूर → घटे; पवन चाल बदलती है, आवृत्ति नहीं।
  • परिमित स्पंद की कोई एक आवृत्ति/तरंगदैर्घ्य नहीं होती — केवल चाल निश्चित होती है।
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