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Bihar Board • Class 11 • Hindi • Digant Bhag-1

पद्य खंड — Chapter 7: तोड़ती पत्थर

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता — धूप में पत्थर तोड़ती मज़दूरिन, श्रम की गरिमा और समाज का विरोधाभास।

Original notes — ready Bihar Board — BSEB (Hindi Medium) • Class 11 • Hindi • Book: Digant Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali)

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तोड़ती पत्थर — EG के अपने नोट्स, सरल शब्दों में

पुस्तक: Digant Bhag-1 (Purani pustak — 2025 se pehle wali) (BSEB, Class 11)  |  पद्य खंड — अध्याय 7  |  प्रकार: कविता (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)  |  माध्यम: हिंदी

यह पृष्ठ Educational Galaxy के अपने मूल नोट्स हैं — पाठ का विषय-स्तरीय (theme-level) सार, किताब की नकल नहीं। यहाँ कोई आधिकारिक BSTBPC PDF नहीं दिया जाता है।

तोड़ती पत्थर के लिए लेबल वाला चित्र

चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): सड़क पर पत्थर तोड़ती मज़दूर स्त्री का सामान्य चित्र — श्रम की गरिमा।

तोड़ती पत्थर के लिए चित्र

इमारत बनाते मज़दूर — विकास किन हाथों से खड़ा होता है, इसका सामान्य चित्र।

तोड़ती पत्थर के लिए लेबल वाला चित्र

नया चित्र (लेबल चित्र पर ही छपे हैं): तोड़ती पत्थर — निराला, श्रम, मज़दूरिन और पत्थर।

इस अध्याय के बारे में

'तोड़ती पत्थर' निराला की प्रसिद्ध कविता है, जिसमें एक मज़दूर स्त्री पत्थर तोड़ती हुई दिखाई देती है। इलाहाबाद की सड़क पर, धूप में, वह स्त्री हथौड़े से पत्थर तोड़ रही है — कवि इस साधारण दृश्य को देखकर रुक जाता है और उसके श्रम की गरिमा को पहचानता है।

कविता की विशेषता यह है कि कवि स्त्री के प्रति दया नहीं दिखाता, बल्कि उसके श्रम का सम्मान करता है। वह देखता है कि समाज की बड़ी इमारतें इन्हीं मज़दूरों के हाथों से बनती हैं, पर उन्हीं के जीवन में सबसे अधिक कठिनाई है — यही विरोधाभास कविता का केंद्र है।

इस पाठ की सीख यह है कि श्रम का सम्मान करना चाहिए, चाहे वह किसी का भी हो। 'तोड़ती पत्थर' हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास की इमारत किन हाथों से खड़ी होती है और उन हाथों का जीवन कैसा है।

क्या सीखना है

निराला की दृष्टि से श्रम की गरिमा और मज़दूर जीवन के विरोधाभास को समझें।

मुख्य शब्द

  • मज़दूर — शारीरिक श्रम से जीविका कमाने वाला व्यक्ति।
  • श्रम की गरिमा — हर काम का अपना सम्मान।
  • विरोधाभास — दो बातों का एक साथ सच होना जो परस्पर विरोधी लगें।
  • छायावाद — हिंदी कविता की एक प्रमुख धारा, जिसमें निराला प्रमुख हैं।
  • हथौड़ा — पत्थर तोड़ने का औज़ार।

याद रखें

  • निराला छायावाद के प्रमुख कवि हैं।
  • कविता में एक मज़दूर स्त्री पत्थर तोड़ती है।
  • कवि दया नहीं, श्रम का सम्मान दिखाता है।
  • इमारतें मज़दूरों के हाथों से बनती हैं, पर उन्हीं का जीवन कठिन है।

परीक्षा टिप / सामान्य गलती

सामान्य गलती: केवल 'गरीब मज़दूरिन की कविता' लिख देना। परीक्षा में श्रम की गरिमा और विरोधाभास का उल्लेख भी करें।

Chart / Table: तोड़ती पत्थर — मुख्य बिंदु

विषयविवरण
कविसूर्यकांत त्रिपाठी निराला
धाराछायावाद
दृश्यसड़क पर पत्थर तोड़ती स्त्री
कवि की दृष्टिदया नहीं, श्रम का सम्मान
केंद्रश्रम की गरिमा और विरोधाभास

अभ्यास — Practice set (स्वयं करके देखें)

  1. कवि सड़क पर रुककर क्या देखता है?
    संकेत: संकेत: पत्थर तोड़ती स्त्री के दृश्य पर ध्यान दें।
  2. कवि स्त्री के प्रति दया क्यों नहीं दिखाता?
    संकेत: संकेत: सम्मान और दया के अंतर की बात सोचें।
  3. कविता का विरोधाभास क्या है?
    संकेत: संकेत: इमारतें बनाने वालों के कठिन जीवन की बात सोचें।
  4. श्रम की गरिमा से क्या आशय है?
    संकेत: संकेत: हर काम के सम्मान की बात सोचें।
  5. अपने आस-पास के किसी श्रमिक के काम का सम्मान करते हुए चार पंक्तियाँ लिखें।
    संकेत: संकेत: उसके काम के महत्त्व पर ध्यान दें।

प्रश्न और उत्तर

  1. इस कविता के कवि कौन हैं?
    सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, छायावाद के प्रमुख कवि।
  2. कविता में कौन-सा दृश्य है?
    इलाहाबाद की सड़क पर धूप में एक मज़दूर स्त्री हथौड़े से पत्थर तोड़ रही है।
  3. कवि स्त्री के प्रति कैसी दृष्टि रखता है?
    दया की नहीं, सम्मान की — वह उसके श्रम की गरिमा को पहचानता है।
  4. कविता का विरोधाभास क्या है?
    समाज की बड़ी इमारतें मज़दूरों के हाथों से बनती हैं, पर उन्हीं मज़दूरों का जीवन सबसे कठिन है।
  5. इस पाठ की मुख्य सीख क्या है?
    श्रम का सम्मान करना चाहिए, चाहे वह किसी का भी हो।

इस पृष्ठ का उपयोग कैसे करें: पहले सार पढ़ें, मुख्य शब्द अपने शब्दों में कहें, फिर बिना देखे अभ्यास करें। अंत में प्रश्न और उत्तर से अपनी जाँच करें। अपने शिक्षक या माता-पिता से उत्तर जँचवाएँ।

Recap — दोहराएँ
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